ईश्वर एक विश्वास है जो हम सभी में है, अपने अंतर्मन में यदि हम टटोलेंगे तो हमें अवश्य ही उसका आभास होगा। शुभम द्विवेदी ने अपनी कविता में भगवान के प्रति श्रद्धापूर्ण कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं जो हमारे विश्वास को और बलवान बनाती हैं।

मानों तो मैं हूँ भगवान
न मानो तो पत्थर।
मानों तो हर जगह हूँ,
न मानों तो कहीं नहीं।

आत्मा से सुमिरन करो,
हाज़िर पाओगे।
बेमन जो सुमिरेगा,
कभी न मैं आता हूं।

न्याय नीति जो करता है,
सदा सहाय मैं हो जाता हूं।
कर्म कर जो बढ़ता है,
सफ़लता उसे दिलाता हूं।

मुफ्त की रोटी जो तोड़े,
सहाय न मैं उसका होता हूँ।
कारण बिन जो भटके,
राह उसे दिखाता हूँ।

सब को मैं नित,
एक समान मैं देखता हूँ।

~ शुभम द्विवेदी

हिन्दी बोल इंडिया के फेसबुक पेज़ पर भी कलमकार की इस प्रस्तुति को पोस्ट किया गया है।
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