भस्म कर दूं स्वयं को
अंगारों को पाल रखूँ सीने में।

देश जिनके कर्मों पर खड़ा है
सड़कों पर आज बेबस लाचार रह गया है।

मर रहे हैं सड़कों पर इसे कफ़न नसीब कर दो
जिंदा ना सही, लाशों को उसके घर वालों से मिलवा दो।

बेबस है जिंदगी इसे दौलत नहीं चाहिए
इसे एक नजर बच्चों से मिलवा दो।

यहां रहे वहां रहे मरना तय है
बस दो पल इसे घरवालों से मिला दे।

वो जो कह रहा है, खबर इतनी भी अच्छी नहीं है
सड़कों पर चलते कदमों के निशान कुछ दूर तक ही है।

ना वह वापस लोटा ना ही घर पहुंचा
ना जाने कदमों के निशान कहां गुम हो गए।

~ मिथुन सिन्हा

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *