आशोब सी बेक़रारी

रज़ा इलाही ने बेक़रारी की तुलना आशोब से करते हुए इस गजल को लिखा है। आप उनकी यह रचना पढ़ें और देंखे की शब्दों को कितनी खूबसूरती से सँजोया गया है।

ये शोख निगाहों की मुख़बिरी
ये झुकी मिज़ग़ां की जादुगरी
ये कुंज-ए-लब की बढ़ती ख़ुमारी
भड़का चली है कहीं कोई चिंगारी

 

ये शम्स-ओ-क़मर सी जल्वागरी
ये हर लम्हों में एक अदा नई
ये उनकी मिन्नत-ओ-इज्ज़-ओ-इंकिसारी
दे चली है जो आशोब सी बेक़रारी

 

ये महफ़िलों में भी खल्वतदारी
ये उनके हर्फ़-ए-दुआ में पाएदारी
जिसके मुहासिबा में नहीं कोई रियाज़ी
खिला चली है जो दिलों की क्यारी

 

~ रज़ा इलाही

——————————————-
आशोब= disturbance, उथल-पुथल, उपद्रव, इन्किलाब
शोख निगाहों = cheerful glance;
मुख़बिरी = information, report;
मिज़ग़ां = eyelashes;
ख़ुमारी = intoxication;
कुंज-ए-लब = bower of lip;
शम्स-ओ-क़मर = sun and moon;
मिन्नत-ओ-इज्ज़-ओ-इंकिसारी = courtesy, modesty & humility

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *