प्रकृति का रौद्ररूप

मानव ने की प्रकृति से छेड़छाड़
जंगलों को दिया उजाड़
पेड़ पौधों से की खिलवाड़
खोल दिए विनाश के किबाड़

मात्र स्वार्थ के लिए अपना धर्म भूल गया
मानवता को तज कर संस्कार भूल गया
ईश्वरीय सत्ता को चुनौती दे डाली
परिणाम विनाश महाविनाश

प्रकृति ने रौद्ररूप दिखाया
पूरा विश्व इस से घबराया
हर जगह वयाप्त मौत का साया
खतरा ही खतरा मंडराया

किसी भी ताकत का कोई चलता नहीं जोर है
बड़े बड़े ताकतवर असहाय और कमजोर हैं
असंख्य लोगों की टूट रही सांसो की डोर है
आधि और व्याधियो का चल रहा इक दौर है

हे इंसान संभल जा जिद्द न कर
दंभ घमंड एवं अहंकार का त्याग कर
पा जाएगा जीवन की सही डगर
नहीं तो हो जाएगा दरबदर

~ अशोक शर्मा वशिष्ठ

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