कोरोना की मार है ऐसी

सुनी पड़ी गई सड़के सभी,
और पड़ गई सुनी गलियां।
कोरोना की मार है ऐसी,
घर में दुबकी सारी दुनिया।

मिलना-जुलना अब होता कम ही,
होती ना अपनों की गलबहियाँ।
हैंड-शेक से भला नमस्ते लगता अब तो,
जब भी मिलते दोस्त और सखियाँ।

कोरोना की मार है ऐसी,
घर में दुबकी सारी दुनिया।

पढ़ाई अभी ऑनलाइन ही सही,
खेल-कूद में भी घर की ही बगिया,
कार्टून-गेमों का मजा ख़ूब हैं लेतें,
घर के नटखट मुन्ने और मुन्नियां।

कोरोना की मार है ऐसी,
घर में दुबकी सारी दुनिया।

माँ-बेटी अभी लाइव ही आतें,
ना होती फिजिकल गलबतियाँ।
लॉकडाउन ने जो हाल किया है,
बिछड़े कितने दशरथों की फगुनियाँ।

कोरोना की मार है ऐसी,
घर में दुबकी सारी दुनिया।

फागुन मन से उतरा न था,
आनी थी अभी बसंत की पुरवाइयाँ।
प्रेमियों के ख़्बाब सजोयें ही रह गयें,
अब तो होती फ़ोन पे ही बतियां।

कोरोना की मार है ऐसी,
घर में दुबकी सारी दुनिया।

निर्धन बिना धन बेजार हुए जा रहे,
रुक नही रही बच्चों की सुबकियाँ।
हाकिमों ने भंडारे खोल रखें हैं,
फिर क्यूं दब जाती कुछ की सिसकियाँ।

कोरोना की मार है ऐसी,
घर में दुबकी सारी दुनिया।

भँवरे अब भी फूलों पे बैठ रहें,
फसलें भी दिखा रही सुनहली झलकियां।
पर हवा भली-सी लगती अब तो,
और सुहाती निर्झर बहती नदियाँ।

कोरोना की मार है ऐसी,
घर में दुबकी सारी दुनिया।

नदियाँ,सागर और झीलें कहती,
देखो अब मेरी गहराइयाँ।
जंगल, पहाड़ और जमीन सभी तो,
सिर्फ इंसानों की नही ये दुनिया।

कोरोना की मार है ऐसी,
घर में दुबकी सारी दुनिया।

~ विनय कुमार वैश्यकियार

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